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अनसुलझी जनजाति की समस्या

अनसुलझी जनजाति की समस्या

Book Details

  • Author: ए. बी. बर्धन

  • Edition: 2016

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 9788170072645

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तिका मूल रूप से वर्ष 1972 में अंग्रेज़ी भाषा में लिखी गई थी। इसे जून 1973 में कम्युनिस्ट पार्टी प्रकाशन द्वारा “स्वतंत्रता जयंती श्रृंखला” के अंतर्गत प्रकाशित किया गया। इसके पश्चात् इसका प्रथम हिंदी संस्करण अक्टूबर 1973 में प्रकाशित हुआ, जिसमें भूमिका शामिल नहीं की गई थी और सीधे “जो वायदे किए गए थे” शीर्षक से विषय का प्रवेश कराया गया था।

पुस्तक में स्वतंत्रता के बाद किए गए वादों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच के अंतर पर आलोचनात्मक दृष्टि डाली गई है। लेखक ए. बी. बर्धन राजनीतिक घोषणाओं, नीतिगत दावों और जनता की अपेक्षाओं के संदर्भ में स्वतंत्र भारत की वास्तविकताओं का विश्लेषण करते हैं। यह कृति ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर यह प्रश्न उठाती है कि स्वतंत्रता के उद्देश्यों को किस हद तक पूरा किया गया।

यह पुस्तक भारतीय राजनीति, वामपंथी विचारधारा और स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक–राजनीतिक विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और तथ्यपरक विश्लेषण के कारण यह कृति स्वतंत्र भारत के वादों और यथार्थ को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।



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Original: $0.53

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  • Author: ए. बी. बर्धन

  • Edition: 2016

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 9788170072645

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About the Book
यह पुस्तिका मूल रूप से वर्ष 1972 में अंग्रेज़ी भाषा में लिखी गई थी। इसे जून 1973 में कम्युनिस्ट पार्टी प्रकाशन द्वारा “स्वतंत्रता जयंती श्रृंखला” के अंतर्गत प्रकाशित किया गया। इसके पश्चात् इसका प्रथम हिंदी संस्करण अक्टूबर 1973 में प्रकाशित हुआ, जिसमें भूमिका शामिल नहीं की गई थी और सीधे “जो वायदे किए गए थे” शीर्षक से विषय का प्रवेश कराया गया था।

पुस्तक में स्वतंत्रता के बाद किए गए वादों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच के अंतर पर आलोचनात्मक दृष्टि डाली गई है। लेखक ए. बी. बर्धन राजनीतिक घोषणाओं, नीतिगत दावों और जनता की अपेक्षाओं के संदर्भ में स्वतंत्र भारत की वास्तविकताओं का विश्लेषण करते हैं। यह कृति ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर यह प्रश्न उठाती है कि स्वतंत्रता के उद्देश्यों को किस हद तक पूरा किया गया।

यह पुस्तक भारतीय राजनीति, वामपंथी विचारधारा और स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक–राजनीतिक विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और तथ्यपरक विश्लेषण के कारण यह कृति स्वतंत्र भारत के वादों और यथार्थ को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।