


Concrete Ke Jungle Mein Gum Hote Sahar : कांक्रीट के जंगल में गुम होते शहर
Brand: Sambhavna Prakashan
Features:
- kolkata
- history of india
- history of indian cities
- bollywood
- bengali cinema
- jitendra bhatia
Binding: perfect
Number Of Pages: 334
Details: जितेन्द्र भाटिया की इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि इन पाँच शहरों की गुज़िश्ता ज़िंदगी और इतिहास, पहचान और गली-कूचे, तहज़ीब और तमद्दुन, शहर रहे न रहे, पर यह सब किताब के बहाने रिकार्ड पर तो दर्ज़ हो ही जाएगा। यह किताब इन शहरों की एक रचनात्मक और भौगोलिक पहचान तथा इतिहास सुरक्षित कर रही है। शहरों के मर्सिये भी लिखे गए हैं। यह किताब इन शहरों का मर्सिया तो क़तई नहीं है, पर इसकी उखड़ती साँसों की हँफन ज़रूर है जो कांक्रीट के बढ़ते जंगलों की डरावनी और बढ़ती पदचापों से काँप-काँप जाती है। ‘बाज़ार’ फ़िल्म में मिर्ज़ा शौक़ की मस्नवी ‘ज़हरे इश्क़’ की कुछ प्यारी पंक्तियाँ गायी गयी हैं। इन्हें पढ़िए और देखिए, कहीं यह आपके मरते हुए शहर की आवाज़ तो नहीं है।
देख लो आज हमको जी भर के आता नहीं है फिर कोई मर के।
अभी इन शहरों के मिटने की शुरुआत है। अंत कहाँ, किस रूप में होगा, पता नही। फ़िलहाल तो हम लोग, यानी जितेन्द्र भाटिया, यह हक़ीर फ़कीर या हमारी उम्र के अल्ले-पल्ले जीते हुए दूसरे बहुत से लोग, जिन्होंने अपने-अपने शहर में ज़िंदगी गुज़ारी, वहीं खेले, खाए, पले-बढ़े, वे कुछ कहें न कहें पर अंदर ही अंदर तड़पते हैं, फड़कते हैं। वे और क्या कर सकते हैं सिवाय सय्याद से इल्तिजा करने के
दे फड़कने की इजाज़त सय्याद शबे अव्वल है गिरफ़्तारी की।
प्रियंवद
EAN: 9789392621291
Languages: Hindi
Product Information
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Shipping & Returns
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Description
Brand: Sambhavna Prakashan
Features:
- kolkata
- history of india
- history of indian cities
- bollywood
- bengali cinema
- jitendra bhatia
Binding: perfect
Number Of Pages: 334
Details: जितेन्द्र भाटिया की इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि इन पाँच शहरों की गुज़िश्ता ज़िंदगी और इतिहास, पहचान और गली-कूचे, तहज़ीब और तमद्दुन, शहर रहे न रहे, पर यह सब किताब के बहाने रिकार्ड पर तो दर्ज़ हो ही जाएगा। यह किताब इन शहरों की एक रचनात्मक और भौगोलिक पहचान तथा इतिहास सुरक्षित कर रही है। शहरों के मर्सिये भी लिखे गए हैं। यह किताब इन शहरों का मर्सिया तो क़तई नहीं है, पर इसकी उखड़ती साँसों की हँफन ज़रूर है जो कांक्रीट के बढ़ते जंगलों की डरावनी और बढ़ती पदचापों से काँप-काँप जाती है। ‘बाज़ार’ फ़िल्म में मिर्ज़ा शौक़ की मस्नवी ‘ज़हरे इश्क़’ की कुछ प्यारी पंक्तियाँ गायी गयी हैं। इन्हें पढ़िए और देखिए, कहीं यह आपके मरते हुए शहर की आवाज़ तो नहीं है।
देख लो आज हमको जी भर के आता नहीं है फिर कोई मर के।
अभी इन शहरों के मिटने की शुरुआत है। अंत कहाँ, किस रूप में होगा, पता नही। फ़िलहाल तो हम लोग, यानी जितेन्द्र भाटिया, यह हक़ीर फ़कीर या हमारी उम्र के अल्ले-पल्ले जीते हुए दूसरे बहुत से लोग, जिन्होंने अपने-अपने शहर में ज़िंदगी गुज़ारी, वहीं खेले, खाए, पले-बढ़े, वे कुछ कहें न कहें पर अंदर ही अंदर तड़पते हैं, फड़कते हैं। वे और क्या कर सकते हैं सिवाय सय्याद से इल्तिजा करने के
दे फड़कने की इजाज़त सय्याद शबे अव्वल है गिरफ़्तारी की।
प्रियंवद
EAN: 9789392621291
Languages: Hindi
















