
मेक इन इंडिया
Book Details
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Author: अरुणा सिन्हा दास
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Edition: अगस्त 2018
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Cover: Paperback
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक भारत में विनिवेश और निजीकरण की नीतियों पर एक आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत करती है। लेखिका अरुणा सिन्हा दास इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं कि भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जहाँ विनिवेश के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया गया है। पुस्तक में यह तर्क दिया गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ सरकारों, विशेष रूप से भाजपा सरकार के कार्यकाल में, निजी क्षेत्र के कुछ बड़े और प्रभावशाली पूँजीपतियों को देश की सार्वजनिक संपदा और बहुमूल्य परिसंपत्तियाँ सौंपने की प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया गया।
लेखिका इस नीति को मात्र आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों वाला कदम मानती हैं। पुस्तक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार विनिवेश और निजीकरण की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र, श्रमिकों और आम नागरिकों के हितों को प्रभावित करती हैं।
यह कृति भारतीय अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति, निजीकरण और समकालीन राजनीतिक विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तथ्यपरक तर्कों और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ लिखी गई यह पुस्तक पाठकों को भारत में आर्थिक नीतियों की दिशा पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है।
Original: $0.32
-69%$0.32
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Description
Book Details
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Author: अरुणा सिन्हा दास
-
Edition: अगस्त 2018
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Cover: Paperback
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक भारत में विनिवेश और निजीकरण की नीतियों पर एक आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत करती है। लेखिका अरुणा सिन्हा दास इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं कि भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जहाँ विनिवेश के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया गया है। पुस्तक में यह तर्क दिया गया है कि केंद्र में सत्तारूढ़ सरकारों, विशेष रूप से भाजपा सरकार के कार्यकाल में, निजी क्षेत्र के कुछ बड़े और प्रभावशाली पूँजीपतियों को देश की सार्वजनिक संपदा और बहुमूल्य परिसंपत्तियाँ सौंपने की प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया गया।
लेखिका इस नीति को मात्र आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों वाला कदम मानती हैं। पुस्तक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार विनिवेश और निजीकरण की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र, श्रमिकों और आम नागरिकों के हितों को प्रभावित करती हैं।
यह कृति भारतीय अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति, निजीकरण और समकालीन राजनीतिक विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तथ्यपरक तर्कों और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ लिखी गई यह पुस्तक पाठकों को भारत में आर्थिक नीतियों की दिशा पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करती है।












