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प्राचीन भारत के पक्ष में

प्राचीन भारत के पक्ष में

Book Details

  • Author: आर. एस. शर्मा

  • Edition: 1993

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 8170071682

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक प्रख्यात इतिहासकार आर. एस. शर्मा की चर्चित कृतियों में से एक है, जो प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन से जुड़ी वैचारिक बहसों और चुनौतियों को सामने लाती है। लेखक बताते हैं कि धर्मार्थ और दकियानूसी तत्वों के आंदोलन के परिणामस्वरूप मई 1978 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने उनकी पुस्तक प्राचीन भारत को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय लिया था। लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह निर्णय इतिहास के विषय विशेषज्ञों की सम्मति के विपरीत था।

पुस्तक में यह रेखांकित किया गया है कि इतिहास से जुड़े विषयों पर निर्णय विशेषज्ञ समितियों द्वारा होने चाहिए। इसी संदर्भ में लेखक बताते हैं कि इतिहास की कमेटी ऑफ कोर्सेज ने उसी वर्ष कुछ समय पहले उनकी पुस्तक को पाठ्यक्रम में बनाए रखने का फैसला किया था। यह स्थिति उस दौर की वैचारिक टकराहटों और अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों को उजागर करती है।

यह कृति न केवल प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने में सहायक है, बल्कि इतिहास लेखन, पाठ्यक्रम निर्माण और वैचारिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करती है। इतिहास, शिक्षा नीति और बौद्धिक स्वतंत्रता में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी और विचारोत्तेजक मानी जाती है।



$0.03

Original: $0.09

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About the Book
यह पुस्तक प्रख्यात इतिहासकार आर. एस. शर्मा की चर्चित कृतियों में से एक है, जो प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन से जुड़ी वैचारिक बहसों और चुनौतियों को सामने लाती है। लेखक बताते हैं कि धर्मार्थ और दकियानूसी तत्वों के आंदोलन के परिणामस्वरूप मई 1978 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने उनकी पुस्तक प्राचीन भारत को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय लिया था। लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह निर्णय इतिहास के विषय विशेषज्ञों की सम्मति के विपरीत था।

पुस्तक में यह रेखांकित किया गया है कि इतिहास से जुड़े विषयों पर निर्णय विशेषज्ञ समितियों द्वारा होने चाहिए। इसी संदर्भ में लेखक बताते हैं कि इतिहास की कमेटी ऑफ कोर्सेज ने उसी वर्ष कुछ समय पहले उनकी पुस्तक को पाठ्यक्रम में बनाए रखने का फैसला किया था। यह स्थिति उस दौर की वैचारिक टकराहटों और अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों को उजागर करती है।

यह कृति न केवल प्राचीन भारतीय इतिहास को समझने में सहायक है, बल्कि इतिहास लेखन, पाठ्यक्रम निर्माण और वैचारिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करती है। इतिहास, शिक्षा नीति और बौद्धिक स्वतंत्रता में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी और विचारोत्तेजक मानी जाती है।