
प्राचीन भारत में जनजीवन
Book Details
-
Author: एस. आर. भट्ट
-
Edition: फ़रवरी 2025
-
Cover: Paperback
-
ISBN: 9789395557719
-
Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक आज़ादी के कई दशक बाद भी भारतीय समाज के सामने बनी हुई बुनियादी समस्याओं का गंभीर और विचारोत्तेजक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक एस. आर. भट्ट यह प्रश्न उठाते हैं कि देश की स्वतंत्रता के चालीस वर्ष बाद भी वे समस्याएँ क्यों बनी रहीं, जो आज़ादी के समय आम लोगों को परेशान कर रही थीं—और समय के साथ वे और अधिक गहरी क्यों हो गईं।
पुस्तक में गरीबी, बेरोज़गारी और महँगाई जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया है। लेखक बताते हैं कि किस प्रकार बढ़ती महँगाई के कारण श्रमजीवी वर्ग की वास्तविक आय लगातार घटती जा रही है और बेरोज़गारी आम लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। इन आर्थिक–सामाजिक समस्याओं को केवल आँकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि आम जनता के दैनिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह कृति भारतीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषमता और विकास की वास्तविकताओं को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। स्पष्ट भाषा और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ लिखी गई यह पुस्तक समकालीन भारत की सामाजिक–आर्थिक चुनौतियों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है और पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है।
Original: $0.53
-70%$0.53
$0.16Product Information
Product Information
Shipping & Returns
Shipping & Returns
Description
Book Details
-
Author: एस. आर. भट्ट
-
Edition: फ़रवरी 2025
-
Cover: Paperback
-
ISBN: 9789395557719
-
Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक आज़ादी के कई दशक बाद भी भारतीय समाज के सामने बनी हुई बुनियादी समस्याओं का गंभीर और विचारोत्तेजक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक एस. आर. भट्ट यह प्रश्न उठाते हैं कि देश की स्वतंत्रता के चालीस वर्ष बाद भी वे समस्याएँ क्यों बनी रहीं, जो आज़ादी के समय आम लोगों को परेशान कर रही थीं—और समय के साथ वे और अधिक गहरी क्यों हो गईं।
पुस्तक में गरीबी, बेरोज़गारी और महँगाई जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया है। लेखक बताते हैं कि किस प्रकार बढ़ती महँगाई के कारण श्रमजीवी वर्ग की वास्तविक आय लगातार घटती जा रही है और बेरोज़गारी आम लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। इन आर्थिक–सामाजिक समस्याओं को केवल आँकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि आम जनता के दैनिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह कृति भारतीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषमता और विकास की वास्तविकताओं को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। स्पष्ट भाषा और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ लिखी गई यह पुस्तक समकालीन भारत की सामाजिक–आर्थिक चुनौतियों पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है और पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है।












