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मोदी सरकार के तीन किसान विरोधी कॉर्पोरेटपरस्त कृषि कानून

मोदी सरकार के तीन किसान विरोधी कॉर्पोरेटपरस्त कृषि कानून

Book Details

  • Author: आर. एस. यादव

  • Edition: नवंबर 2020

  • Cover: Paperback

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक समकालीन भारतीय कृषि राजनीति और किसान आंदोलनों के एक निर्णायक दौर को केंद्र में रखकर लिखी गई है। लेखक आर. एस. यादव हाल के वर्षों में एनडीए सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध देशभर में उभरे व्यापक किसान आंदोलन का विश्लेषण करते हैं। पुस्तक में यह रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार विभिन्न राज्यों के किसान एकजुट होकर इन कानूनों के खिलाफ खड़े हुए और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित संघर्ष किया।

लेखक सरकार के उस दावे की भी आलोचनात्मक समीक्षा करते हैं जिसमें कहा गया कि इन कानूनों से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और पूरे कृषि क्षेत्र को लाभ होगा। पुस्तक में यह दिखाया गया है कि जमीनी स्तर पर किसानों की चिंताएँ क्या हैं, भ्रामक प्रचार किस तरह किया गया, और इन नीतियों के संभावित दीर्घकालिक प्रभाव कृषि व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान जीवन पर कैसे पड़ सकते हैं।

यह कृति किसान आंदोलन, कृषि नीतियों, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। तथ्यपरक दृष्टि, समकालीन संदर्भ और स्पष्ट भाषा के कारण यह पुस्तक वर्तमान समय के एक महत्वपूर्ण सामाजिक–राजनीतिक दस्तावेज़ के रूप में सामने आती है।

$0.03

Original: $0.11

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  • Author: आर. एस. यादव

  • Edition: नवंबर 2020

  • Cover: Paperback

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About the Book
यह पुस्तक समकालीन भारतीय कृषि राजनीति और किसान आंदोलनों के एक निर्णायक दौर को केंद्र में रखकर लिखी गई है। लेखक आर. एस. यादव हाल के वर्षों में एनडीए सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध देशभर में उभरे व्यापक किसान आंदोलन का विश्लेषण करते हैं। पुस्तक में यह रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार विभिन्न राज्यों के किसान एकजुट होकर इन कानूनों के खिलाफ खड़े हुए और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित संघर्ष किया।

लेखक सरकार के उस दावे की भी आलोचनात्मक समीक्षा करते हैं जिसमें कहा गया कि इन कानूनों से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और पूरे कृषि क्षेत्र को लाभ होगा। पुस्तक में यह दिखाया गया है कि जमीनी स्तर पर किसानों की चिंताएँ क्या हैं, भ्रामक प्रचार किस तरह किया गया, और इन नीतियों के संभावित दीर्घकालिक प्रभाव कृषि व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान जीवन पर कैसे पड़ सकते हैं।

यह कृति किसान आंदोलन, कृषि नीतियों, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। तथ्यपरक दृष्टि, समकालीन संदर्भ और स्पष्ट भाषा के कारण यह पुस्तक वर्तमान समय के एक महत्वपूर्ण सामाजिक–राजनीतिक दस्तावेज़ के रूप में सामने आती है।