
पाप और विज्ञान
Book Details
-
Author: डायसन कार्टर
-
Edition: 1988
-
Cover: Paperback
-
ISBN: 8170072051
-
Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक समाज, नैतिकता, अपराध और विज्ञान के आपसी संबंधों पर एक विचारोत्तेजक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक डायसन कार्टर आधुनिक नगर और सभ्य समाज के संदर्भ में यह प्रश्न उठाते हैं कि अपराध, पाप और विज्ञान जैसे शब्दों का वास्तविक अर्थ क्या है और ये अवधारणाएँ समाज में कैसे परिभाषित की जाती हैं।
पुस्तक विशेष रूप से यह स्पष्ट करती है कि “पाप” की धारणा किसी सार्वभौमिक सत्य पर आधारित नहीं होती, बल्कि यह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार बदलती रहती है। उदाहरण के तौर पर, लेखक बताते हैं कि जहाँ इस्लाम में शराब पीना पाप माना जाता है और हिंदू धर्म में गाय का मांस खाना पाप समझा जाता है, वहीं ईसाई धर्म में ये दोनों ही कार्य पाप की श्रेणी में नहीं आते। इस प्रकार पाप की अलग-अलग व्याख्याएँ समाज में नैतिकता को लेकर अनेक विरोधाभास उत्पन्न करती हैं।
डायसन कार्टर यह तर्क रखते हैं कि जब समाज में नैतिक मूल्यों की परिभाषाएँ इतनी भिन्न हों, तो अपराध और पाप के बीच की रेखा भी धुंधली हो जाती है। पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से इन धार्मिक और सामाजिक धारणाओं की समीक्षा करती है और पाठक को तर्क, विवेक और सामाजिक चेतना के आधार पर सोचने के लिए प्रेरित करती है।
यह कृति उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो समाजशास्त्र, दर्शन, धर्म, नैतिकता और आधुनिक वैज्ञानिक सोच में रुचि रखते हैं। विचारशील भाषा और गहन विश्लेषण के कारण यह पुस्तक समाज की जटिल नैतिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
Product Information
Product Information
Shipping & Returns
Shipping & Returns
Description
Book Details
-
Author: डायसन कार्टर
-
Edition: 1988
-
Cover: Paperback
-
ISBN: 8170072051
-
Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक समाज, नैतिकता, अपराध और विज्ञान के आपसी संबंधों पर एक विचारोत्तेजक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक डायसन कार्टर आधुनिक नगर और सभ्य समाज के संदर्भ में यह प्रश्न उठाते हैं कि अपराध, पाप और विज्ञान जैसे शब्दों का वास्तविक अर्थ क्या है और ये अवधारणाएँ समाज में कैसे परिभाषित की जाती हैं।
पुस्तक विशेष रूप से यह स्पष्ट करती है कि “पाप” की धारणा किसी सार्वभौमिक सत्य पर आधारित नहीं होती, बल्कि यह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार बदलती रहती है। उदाहरण के तौर पर, लेखक बताते हैं कि जहाँ इस्लाम में शराब पीना पाप माना जाता है और हिंदू धर्म में गाय का मांस खाना पाप समझा जाता है, वहीं ईसाई धर्म में ये दोनों ही कार्य पाप की श्रेणी में नहीं आते। इस प्रकार पाप की अलग-अलग व्याख्याएँ समाज में नैतिकता को लेकर अनेक विरोधाभास उत्पन्न करती हैं।
डायसन कार्टर यह तर्क रखते हैं कि जब समाज में नैतिक मूल्यों की परिभाषाएँ इतनी भिन्न हों, तो अपराध और पाप के बीच की रेखा भी धुंधली हो जाती है। पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से इन धार्मिक और सामाजिक धारणाओं की समीक्षा करती है और पाठक को तर्क, विवेक और सामाजिक चेतना के आधार पर सोचने के लिए प्रेरित करती है।
यह कृति उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो समाजशास्त्र, दर्शन, धर्म, नैतिकता और आधुनिक वैज्ञानिक सोच में रुचि रखते हैं। विचारशील भाषा और गहन विश्लेषण के कारण यह पुस्तक समाज की जटिल नैतिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देती है।











