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भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत

भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत

Book Details

  • Author: देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय

  • Edition: दिसंबर 2007

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 8170072026

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय द्वारा भारतीय दार्शनिक परंपराओं का एक आलोचनात्मक और समकालीन दृष्टि से किया गया महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत करती है। लेखक का मानना है कि आज की दार्शनिक अपेक्षाएँ—धर्मनिरपेक्षता, बुद्धिवाद और विज्ञान की ओर उन्मुखता—हमारे समय की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं, और इन्हीं के आलोक में भारत की दार्शनिक विरासत का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

पुस्तक में लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि परंपरागत भारतीय दर्शन के विशाल भंडार में ऐसी कई धारणाएँ और प्रवृत्तियाँ भी मौजूद रही हैं, जो इन आधुनिक अपेक्षाओं का विरोध करती हैं। लेखक इन्हें अतीतकाल का ऐसा अचल भार मानते हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से प्राचीन और मध्यकालीन भारत में प्रगति को बाधित किया और जो आज भी हमारी समकालीन प्रगति को कुंठित करने की प्रवृत्ति रखता है।

यह कृति भारतीय दर्शन, बौद्धिक इतिहास और आधुनिक वैचारिक विमर्श में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तर्कसंगत विश्लेषण, ऐतिहासिक दृष्टिकोण और स्पष्ट वैचारिक पक्षधरता के कारण यह पुस्तक भारतीय दार्शनिक परंपरा को आधुनिक संदर्भों में समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।



$1.60

Original: $5.33

-70%
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  • Author: देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय

  • Edition: दिसंबर 2007

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 8170072026

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About the Book
यह पुस्तक देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय द्वारा भारतीय दार्शनिक परंपराओं का एक आलोचनात्मक और समकालीन दृष्टि से किया गया महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत करती है। लेखक का मानना है कि आज की दार्शनिक अपेक्षाएँ—धर्मनिरपेक्षता, बुद्धिवाद और विज्ञान की ओर उन्मुखता—हमारे समय की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं, और इन्हीं के आलोक में भारत की दार्शनिक विरासत का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

पुस्तक में लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि परंपरागत भारतीय दर्शन के विशाल भंडार में ऐसी कई धारणाएँ और प्रवृत्तियाँ भी मौजूद रही हैं, जो इन आधुनिक अपेक्षाओं का विरोध करती हैं। लेखक इन्हें अतीतकाल का ऐसा अचल भार मानते हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से प्राचीन और मध्यकालीन भारत में प्रगति को बाधित किया और जो आज भी हमारी समकालीन प्रगति को कुंठित करने की प्रवृत्ति रखता है।

यह कृति भारतीय दर्शन, बौद्धिक इतिहास और आधुनिक वैचारिक विमर्श में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तर्कसंगत विश्लेषण, ऐतिहासिक दृष्टिकोण और स्पष्ट वैचारिक पक्षधरता के कारण यह पुस्तक भारतीय दार्शनिक परंपरा को आधुनिक संदर्भों में समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।