
मेक इन इंडिया - आँखों में धूल
Book Details
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Author: सी. मुरलीधर, एम्. सत्यानंद
-
Edition: दिसंबर 2015
-
Cover: Paperback
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक भारत में विनिवेश और निजीकरण की नीतियों पर एक तीखा और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं कि भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ विनिवेश के लिए अलग से मंत्रालय का गठन किया गया। पुस्तक में तर्क दिया गया है कि यह व्यवस्था विशेष रूप से केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के कार्यकाल में विकसित हुई, जिसका उद्देश्य देश की सार्वजनिक संपदा और बहुमूल्य परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र के कुछ शक्तिशाली और चालाक पूँजीपतियों के हाथों सौंपना रहा है।
लेखक इस प्रक्रिया को केवल आर्थिक नीति के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक निर्णय के रूप में देखते हैं, जिसके दूरगामी सामाजिक और आर्थिक परिणाम हैं। पुस्तक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार विनिवेश की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र, श्रमिक वर्ग और आम जनता के हितों को प्रभावित करती हैं और राज्य की भूमिका को कमजोर करती हैं।
यह कृति भारतीय अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति, निजीकरण और समकालीन राजनीतिक विमर्श में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तथ्यपरक तर्कों और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण यह पुस्तक भारत में विनिवेश की राजनीति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।
Original: $11.10
-70%$11.10
$3.33Product Information
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Description
Book Details
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Author: सी. मुरलीधर, एम्. सत्यानंद
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Edition: दिसंबर 2015
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Cover: Paperback
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक भारत में विनिवेश और निजीकरण की नीतियों पर एक तीखा और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखक यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं कि भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ विनिवेश के लिए अलग से मंत्रालय का गठन किया गया। पुस्तक में तर्क दिया गया है कि यह व्यवस्था विशेष रूप से केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के कार्यकाल में विकसित हुई, जिसका उद्देश्य देश की सार्वजनिक संपदा और बहुमूल्य परिसंपत्तियों को निजी क्षेत्र के कुछ शक्तिशाली और चालाक पूँजीपतियों के हाथों सौंपना रहा है।
लेखक इस प्रक्रिया को केवल आर्थिक नीति के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक निर्णय के रूप में देखते हैं, जिसके दूरगामी सामाजिक और आर्थिक परिणाम हैं। पुस्तक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार विनिवेश की नीतियाँ सार्वजनिक क्षेत्र, श्रमिक वर्ग और आम जनता के हितों को प्रभावित करती हैं और राज्य की भूमिका को कमजोर करती हैं।
यह कृति भारतीय अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक नीति, निजीकरण और समकालीन राजनीतिक विमर्श में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तथ्यपरक तर्कों और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण यह पुस्तक भारत में विनिवेश की राजनीति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।










