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प्राचीन भारत में भौतिकतावाद

प्राचीन भारत में भौतिकतावाद

Book Details

  • Author: देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय

  • Edition: दिसंबर 2007

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 8170071100

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक प्रख्यात दार्शनिक और विचारक देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय के गहन दार्शनिक अनुसंधान का महत्वपूर्ण परिणाम है। लेखक ने इस कृति की भूमिका में भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद (Indian Council of Philosophical Research), नई दिल्ली के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिसने उन्हें राष्ट्रीय फेलोशिप प्रदान कर पूर्णकालिक दार्शनिक गतिविधियों में संलग्न रहने का अवसर दिया। लेखक के अनुसार, इस सहयोग के बिना सीमित समय में इस पुस्तक को पूरा कर पाना कठिन होता।

पुस्तक में भारतीय दर्शन से जुड़े मूल प्रश्नों, वैचारिक परंपराओं और दार्शनिक समस्याओं का वैज्ञानिक, तर्कसंगत और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय का दृष्टिकोण परंपरागत व्याख्याओं से आगे बढ़ते हुए दर्शन को ऐतिहासिक और भौतिक संदर्भों में समझने पर बल देता है।

यह कृति दर्शन, भारतीय बौद्धिक परंपरा, इतिहास और वैचारिक अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और गंभीर पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। अकादमिक गहराई, वैचारिक स्पष्टता और शोधपरक दृष्टिकोण के कारण यह पुस्तक भारतीय दर्शन के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।

$0.64

Original: $2.13

-70%
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  • Author: देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय

  • Edition: दिसंबर 2007

  • Cover: Paperback

  • ISBN: 8170071100

  • Multiple Book Set: No

About the Book
यह पुस्तक प्रख्यात दार्शनिक और विचारक देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय के गहन दार्शनिक अनुसंधान का महत्वपूर्ण परिणाम है। लेखक ने इस कृति की भूमिका में भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद (Indian Council of Philosophical Research), नई दिल्ली के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिसने उन्हें राष्ट्रीय फेलोशिप प्रदान कर पूर्णकालिक दार्शनिक गतिविधियों में संलग्न रहने का अवसर दिया। लेखक के अनुसार, इस सहयोग के बिना सीमित समय में इस पुस्तक को पूरा कर पाना कठिन होता।

पुस्तक में भारतीय दर्शन से जुड़े मूल प्रश्नों, वैचारिक परंपराओं और दार्शनिक समस्याओं का वैज्ञानिक, तर्कसंगत और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्यय का दृष्टिकोण परंपरागत व्याख्याओं से आगे बढ़ते हुए दर्शन को ऐतिहासिक और भौतिक संदर्भों में समझने पर बल देता है।

यह कृति दर्शन, भारतीय बौद्धिक परंपरा, इतिहास और वैचारिक अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और गंभीर पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। अकादमिक गहराई, वैचारिक स्पष्टता और शोधपरक दृष्टिकोण के कारण यह पुस्तक भारतीय दर्शन के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।