
हिन्दू राष्ट्रवाद और उसका यथार्थ
Book Details
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Author: कृष्णा झा
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Edition: फ़रवरी 2025
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Cover: Paperback
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ISBN: 9788170072577
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक नई शताब्दी के दूसरे दशक में भारत की कथित “धूमिल पड़ती तेजोमयता” को पुनः स्थापित करने के प्रयासों का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखिका कृष्णा झा यह स्पष्ट करती हैं कि इन प्रयासों में विनायक दामोदर सावरकर (1883–1966) के विचारों और उनके आह्वान की गूंज साफ़ तौर पर सुनी जा सकती है।
पुस्तक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार सावरकर के विचार आगे चलकर हिंदू अस्मिता और हिंदू राष्ट्र के नारे के रूप में विकसित हुए। लेखिका इन वैचारिक प्रवृत्तियों को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समकालीन राजनीति के संदर्भ में रखकर देखती हैं तथा यह समझने का प्रयास करती हैं कि इनका भारतीय समाज, लोकतंत्र और बहुलतावादी परंपरा पर क्या प्रभाव पड़ता है।
यह कृति समकालीन भारतीय राजनीति, वैचारिक इतिहास और राष्ट्रवाद के अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तथ्यपरक विश्लेषण, ऐतिहासिक संदर्भ और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण यह पुस्तक आधुनिक भारत में उभरती वैचारिक बहसों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।
Original: $0.69
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Description
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Author: कृष्णा झा
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Edition: फ़रवरी 2025
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Cover: Paperback
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ISBN: 9788170072577
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक नई शताब्दी के दूसरे दशक में भारत की कथित “धूमिल पड़ती तेजोमयता” को पुनः स्थापित करने के प्रयासों का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। लेखिका कृष्णा झा यह स्पष्ट करती हैं कि इन प्रयासों में विनायक दामोदर सावरकर (1883–1966) के विचारों और उनके आह्वान की गूंज साफ़ तौर पर सुनी जा सकती है।
पुस्तक में यह विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार सावरकर के विचार आगे चलकर हिंदू अस्मिता और हिंदू राष्ट्र के नारे के रूप में विकसित हुए। लेखिका इन वैचारिक प्रवृत्तियों को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और समकालीन राजनीति के संदर्भ में रखकर देखती हैं तथा यह समझने का प्रयास करती हैं कि इनका भारतीय समाज, लोकतंत्र और बहुलतावादी परंपरा पर क्या प्रभाव पड़ता है।
यह कृति समकालीन भारतीय राजनीति, वैचारिक इतिहास और राष्ट्रवाद के अध्ययन में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। तथ्यपरक विश्लेषण, ऐतिहासिक संदर्भ और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण यह पुस्तक आधुनिक भारत में उभरती वैचारिक बहसों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।










