
आज का सम्प्रदायवाद और हस्तक्षेप की सार्थकता
Book Details
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Author: के. एन. पानिक्कर
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Edition: जनवरी 2010
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Cover: Paperback
-
ISBN: 81700713310
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तिका 9 अक्टूबर 1990 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के एल. एल. ए. बिल्डिंग, अन्ना साले में आयोजित चौथे वी. पी. चिंतन मेमोरियल लेक्चर का, किंचित संशोधन के साथ, हिंदी रूपांतरण है, जिसे प्रो. के. एन. पानिक्कर ने प्रस्तुत किया था। यह व्याख्यान प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
पुस्तक का विशेष महत्व इस बात में निहित है कि यह केवल वैचारिक आलोचना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समकालीन साम्प्रदायिकता के विरुद्ध व्यावहारिक संघर्ष की आवश्यकता पर भी बल देती है। इस अर्थ में यह कृति का. वी. पी. चिंतन को एक सशक्त श्रद्धांजलि भी है—जो आज भी संघर्षशील विचारों और जनपक्षधर हस्तक्षेपों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।
यह कृति इतिहास, राजनीति, सांस्कृतिक अध्ययन और साम्प्रदायिकता-विरोधी विमर्श में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐतिहासिक संदर्भ, वैचारिक स्पष्टता और व्यावहारिक आग्रह के कारण यह पुस्तक समकालीन भारत की चुनौतियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।
Original: $0.16
-69%$0.16
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Description
Book Details
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Author: के. एन. पानिक्कर
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Edition: जनवरी 2010
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Cover: Paperback
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ISBN: 81700713310
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Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तिका 9 अक्टूबर 1990 को मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के एल. एल. ए. बिल्डिंग, अन्ना साले में आयोजित चौथे वी. पी. चिंतन मेमोरियल लेक्चर का, किंचित संशोधन के साथ, हिंदी रूपांतरण है, जिसे प्रो. के. एन. पानिक्कर ने प्रस्तुत किया था। यह व्याख्यान प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
पुस्तक का विशेष महत्व इस बात में निहित है कि यह केवल वैचारिक आलोचना तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समकालीन साम्प्रदायिकता के विरुद्ध व्यावहारिक संघर्ष की आवश्यकता पर भी बल देती है। इस अर्थ में यह कृति का. वी. पी. चिंतन को एक सशक्त श्रद्धांजलि भी है—जो आज भी संघर्षशील विचारों और जनपक्षधर हस्तक्षेपों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।
यह कृति इतिहास, राजनीति, सांस्कृतिक अध्ययन और साम्प्रदायिकता-विरोधी विमर्श में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐतिहासिक संदर्भ, वैचारिक स्पष्टता और व्यावहारिक आग्रह के कारण यह पुस्तक समकालीन भारत की चुनौतियों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।











