
मार्कस्वादी डाईलेकेटिक्स की मूल समस्याएं
Book Details
-
Author: अनिल राजिमवाले
-
Edition: अगस्त 2009
-
Cover: Paperback
-
ISBN: 9788170072096
-
Multiple Book Set: No
About the Book
यह पुस्तक मार्क्सवाद के मूल दार्शनिक आधार द्वंद्ववाद (Dialectics) पर केंद्रित एक गंभीर और वैचारिक अध्ययन प्रस्तुत करती है। लेखक अनिल राजिमवाले का मानना है कि मार्क्सवाद से संबंधित अधिकांश पुस्तकों में द्वंद्ववाद को वह केंद्रीय स्थान नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तविक रूप से हकदार है। जबकि द्वंद्ववाद ही मार्क्सवादी दर्शन की आत्मा, उसका आधार और उसका केंद्र है।
पुस्तक में द्वंद्ववाद को गति और परिवर्तन के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि द्वंद्ववाद के बिना मार्क्सवादी दर्शन स्थिर और अधूरा हो जाता है। यही वह पद्धति है जो विचारों को गति देती है, जड़ता को तोड़ती है और चिंतन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाती है।
यह कृति मार्क्सवादी दर्शन, द्वंद्वात्मक पद्धति और राजनीतिक विचारधारा में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। वैचारिक स्पष्टता, तर्कसंगत विवेचना और सैद्धांतिक गहराई के कारण यह पुस्तक मार्क्सवाद को उसके दार्शनिक मूल में समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।
Original: $0.80
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Description
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Author: अनिल राजिमवाले
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Edition: अगस्त 2009
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Cover: Paperback
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ISBN: 9788170072096
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About the Book
यह पुस्तक मार्क्सवाद के मूल दार्शनिक आधार द्वंद्ववाद (Dialectics) पर केंद्रित एक गंभीर और वैचारिक अध्ययन प्रस्तुत करती है। लेखक अनिल राजिमवाले का मानना है कि मार्क्सवाद से संबंधित अधिकांश पुस्तकों में द्वंद्ववाद को वह केंद्रीय स्थान नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तविक रूप से हकदार है। जबकि द्वंद्ववाद ही मार्क्सवादी दर्शन की आत्मा, उसका आधार और उसका केंद्र है।
पुस्तक में द्वंद्ववाद को गति और परिवर्तन के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि द्वंद्ववाद के बिना मार्क्सवादी दर्शन स्थिर और अधूरा हो जाता है। यही वह पद्धति है जो विचारों को गति देती है, जड़ता को तोड़ती है और चिंतन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाती है।
यह कृति मार्क्सवादी दर्शन, द्वंद्वात्मक पद्धति और राजनीतिक विचारधारा में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और जागरूक पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। वैचारिक स्पष्टता, तर्कसंगत विवेचना और सैद्धांतिक गहराई के कारण यह पुस्तक मार्क्सवाद को उसके दार्शनिक मूल में समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है।











